इस साल मई में निर्जला एकादशी का व्रत किया जाएगा. जाने ये व्रत क्यो है सबसे कठिन और किसने इसे सबसे पहले किया था.
By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Source : DB News Update
Nirjala Ekadashi 2025: निर्जला एकादशी व्रत और उसके महत्व की जानकारी प्रत्येक हिंदू धर्म को मानने वाले धर्मनिष्ठ को है. फिर भी अधिकांश लोग इसकी महिमा के बारे में नहीं जानते हैं और न ही इस व्रत के महत्व को समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए भीमसेनी एकादशी का महत्व जानना बहुत जरूरी है. यहां हम बतादें कि वृषभ संक्रांति और मिथुन संक्रांति के मध्य में ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है, उसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है. साल की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी है.
जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं. लेकिन ये व्रत सबसे कठिन माना गया है आइए जानते हैं क्यों.
निर्जला एकादशी 2025 कब ?
निर्जला एकादशी 6 जून 2025 को है. इस निर्जला एकादशी के व्रत के पुण्य से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है.
निर्जला एकादशी व्रत क्यों सबसे कठिन है ?
उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है. निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं. इसमें व्रती को 24 घंटे तक निर्जल रहना होता है. ज्येष्ठ माह की तपती गर्मी में बिना जल के ये व्रत करना बेहद कठिन है, लेकिन इसका प्रभाव भी बेहद शक्तिशाली है. इस व्रत को जो पूरे नियम अनुसार कर लेता है उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं.
निर्जला एकादशी व्रत सबसे पहले किसने किया ?
निर्जला एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी एकादशी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. निर्जला एकादशी का व्रत सबसे पहले भीम ने किया था. पाण्डवों में भीमसेन खाने-पीने के अत्यधिक शौक़ीन थे और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं थे. इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाते थे. भीम के अलावा बाकि पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे. भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान थे.
भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं, उन्हें अंत में स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होगी. इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास की शरण ली तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने कि सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है. व्यास जी ने कहा कि जो मनुष्य निर्जलाए एकादशी के कठिन व्रत का पालन करता है. वो स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है.
निर्जला एकादशी व्रत कथा
यह ब्रह्म वैवर्त पुराण की एक पवित्र कथा है.भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति के बावजूद, भीम को अक्सर महीने में दो बार आने वाले एकादशी व्रत का पालन करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता था. उनकी भूख तृप्त नहीं होती थी. उनके भाई सहदेव, नकुल और युधिष्ठिर, और उनकी पत्नी द्रौपदी हर एकादशी को सक्रिय रूप से व्रत रखते थे. लेकिन भीम ऐसा करने में असमर्थ थे. इसलिए वे दुखी हो गए. समाधान की तलाश में, उन्होंने महाभारत के लेखक और पांडवों और कौरवों के दादा ऋषि व्यास से संपर्क किया.
उन्होंने भीम को निर्जला एकादशी का पालन करने की सलाह दी – जो सभी एकादशियों में सबसे कठोर है. भक्तों को 24 घंटे तक पानी और भोजन से दूर रहना पड़ता है व्यास ने बताया कि इस एक व्रत को रखने से ही 24 एकादशी के पुण्य प्राप्त हो जाएंगे. भीम ने बड़ी लगन से व्रत रखा. प्यास और भूख से वे बेहोश हो गए. लेकिन गंगा के पवित्र जल और तुलसी के पत्तों से उन्होंने स्वयं को संवरा और सफलतापूर्वक व्रत पूर्ण किया.
भगवान विष्णु भीम की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया. तब से यह दिन पांडव भीम एकादशी या भीमसेनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है. यह कथा निर्जला एकादशी की शक्ति को दर्शाती है. यह बताती है कि सच्ची भक्ति और निर्धारित नियमों का पालन करने से व्यक्ति स्वयं को शुद्ध कर सकता है और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है.
Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

