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भारत में एक नए विक्रमादित्य का उदय!

DB News
Last updated: 11/03/2026 11:15 AM
DB News
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Kaun Hain Vedamurti Devavrat Mahesh Rekhe: वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने केवल 19 वर्ष की अल्पायु में अध्यात्म, साधना और वैदिक परंपरा में उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की.

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Contents
Kaun Hain Vedamurti Devavrat Mahesh Rekhe: वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने केवल 19 वर्ष की अल्पायु में अध्यात्म, साधना और वैदिक परंपरा में उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की.निर्बाध रूप से पारायण किया19 वर्ष की आयु मिली उपलब्धिकौन हैं देवव्रत महेश रेखे200 साल बाद दोहराया वो असंभव सा कामप्रमानंद जी महाराज ने भी दी शुभकामनासोशल मीडिया में महीनों छाए रहे वेदमूर्ति

India Vedic Knowledge Tradition : महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के निवासी वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने केवल 19 वर्ष की अल्पायु में अध्यात्म, साधना और वैदिक परंपरा की कठोर तपस्या की है. इन्होंने गरिमामय उपलब्धि अर्जित करने वाले दूसरे “दण्डकम विक्रमादित्य” बने हैं. काशी की पवित्र धरती पर निरंतर 50 दिनों की कठोर तपस्या करते हुए शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा के लगभग 2000 मंत्रों के अत्यंत कठिन दण्डक्रम पारायण को अखंड रूप से पूर्ण किया है. इस अद्वितीय साधना की सिद्धि के पश्चात उन्हें प्रतिष्ठित ‘दण्डक्रम विक्रमादित्य’ की सम्मानित उपाधि प्रदान की गई, जो उनके तप, अनुशासन और अदम्य मानसिक शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक है.

निर्बाध रूप से पारायण किया

भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा में आस्था रखने वाले सभी लोगों के लिए यह गौरव का विषय है कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ का 50 दिनों तक निर्बाध, पूर्ण व शुद्ध उच्चारण के साथ पारायण किया. इसमें निहित अनेक वैदिक ऋचाओं और पवित्रतम शब्दों का उन्होंने निष्ठा से पाठ कर हमारी गुरु-शिष्य परंपरा की उत्कृष्टता को पुनः प्रतिष्ठित किया है.

19 वर्ष की आयु मिली उपलब्धि

तेजस्वी वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे जी ने मात्र 19 वर्ष की आयु में जिस अद्वितीय वेदनिष्ठ साधना और तपशक्ति का परिचय दिया है, वह अत्यंत प्रेरक और अनुकरणीय है. इस अद्भुत आध्यात्मिक उपलब्धि पर देश के विद्वतजनों ने उन्हें शुभाशीष और आशीर्वचन प्रदान कर रहे हैं. महाराष्ट्र के 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने 200 साल बाद 50 दिनों में 2000 शुक्ल यजुर्वेद मंत्रों का दंडक्रम पारायणम (दंडक्रम विक्रमादित्य) करके इतिहास रचा है. वाराणसी में संपन्न इस कठिन तपस्या के लिए उन्हें सम्मानित किया गया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी प्रशंसा की.

कौन हैं देवव्रत महेश रेखे

देवव्रत महेश रेखे के पिता महेश चंद्रकांत रेखे खुद बड़े विद्वान हैं और उनके पहले गुरु हैं. महाराष्ट्र के छोटे से गांव से काशी तक का सफर और यहां वेदमूर्ति की उपाधि पाने का एक लंबा और अनुशासित सफर तय किया है. देवव्रत महेश रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए. मात्र 5 साल की उम्र से देवव्रत ने वेद मंत्र बोलना शुरू कर दिया था. आज 19 साल की उम्र में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा को पूरा कंठस्थ कर लिया और ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि पा ली है.

200 साल बाद दोहराया वो असंभव सा काम

जानकारी लगी है कि 2 अक्टूबर से 30 नवंबर तक काशी के रामघाट स्थित वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में देवव्रत ने लगातार 50 दिन तक रोज सुबह 8 से दोपहर 12 बजे तक शुक्ल यजुर्वेद के करीब 2000 मंत्रों का दंडक्रम पारायण किया. दंडक्रम मतलब हर मंत्र को 11-11 अलग-अलग क्रमों में दोहराना होता है. यह इतना कठिन है कि इसे आखिरी बार 200 साल पहले नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने किया था. विश्व में दूसरी बार और भारत में 200 साल बाद यह कारनामा हुआ है.

प्रमानंद जी महाराज ने भी दी शुभकामना

वृन्दावन के सिद्ध और सोशल मीडिया में चर्चित संत स्वामी प्रेमानंद जी महाराज से वेदमूर्ति मिले. उन्होंने वेदमूर्ति को शुभकामना प्रेषित की और ऐसा कार्य करने के साथ वेद की गरिमा और अस्तित्व बनाए रखने के लिए आशिर्वाद प्रदान किया. इसके अलावा देश भर से विद्वत संतों और मंहतों ने वेदमूर्ति को आशिर्वाद दिया. कम उम्र में इतनी बड़ी उपाधि मिलने पर उन्हें शुभकामना प्रेषित की.

सोशल मीडिया में महीनों छाए रहे वेदमूर्ति

वेदमूर्ति को उपाधि मिलने के बाद सोशल मीडिया में शुभकामना देने वालों का सिलसिला महीनों चलता रहा. इस दौरान कई बार ट्रोल करने की भी कोशिश की गई. उनकी विद्वता पर सवाल उठाते हुए कई सोशल मीडिया यूजर्स ने एलन मस्क के एआई तक से तुलना करने की कोशिश की. जबकि एआई में वेदमंत्रों को फीड करने के बाद बोलने की कला आएगी. फिर भी कई यूजर उनकी विद्वता पर सवाल उठाने से गुरेज नहीं किया और जमकर ट्रोल किया. लेकिन भारतवर्ष के मनीषियों ने उनकी विद्वता पर कोई सवाल नहीं किया और उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से शुभकामना प्रेषित की.

Source : SOCIAL MEDIA

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