संत-महंत और श्रद्धालु मिलकर सावन के झूले को आकर्षक स्वरूप देने के लिए करते हैं काम
By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
MP Jabalpur Narasimha Temples News: संस्कारधानी जाबालिपुरम् में 111 साल पुराना प्रसिद्ध श्री नृसिंह भगवान का नरसिंह मंदिर है. जबलपुर शास्त्रीब्रिज गोरखपुर आदि शंकराचार्य चौक के समीप स्थित इस मंदिर की भव्यता और दिव्यता किसी से छिपी नहीं है.इस मंदिर में आने के बाद आध्यात्मकि ऊर्जा का अनुभव सहसा हो जाता है. इस मंदिर में हिंदू धर्म से जुड़े हर तीज-त्योहार और उत्सव को बड़े धूम-धाम से मनाये जाते हैं. सावन माह में नरसिंह मंदिर केवल इसलिए चर्चा का विषय बन गया, क्योंकि इस मंदिर के अंदर तो भगवान श्री नृसिंह की मूर्ति विराजमान है. लेकिन सावन के झूले में भगवान श्रीकृष्ण झूलते नजर आ रहे हैं. मंदिर के निकट डाले गए झूले पर बाल स्वरूप भगवान श्री कृष्ण मीठी मुस्कान के साथ झूला-झूलने का आनंद ले रहे हैं.बताया जा रहा है कि यहां सावन माह का झूला हर वर्ष पड़ता है. भगवान को झूला झुलाने की परंपरा मंदिर की स्थापना काल से चली आ रही है. जिसमें भगवान कृष्ण बाल स्वरूप में विराजमान किये जाते हैं और भगवान को झूला भक्त-संत झुलते हैं. नरसिंह मंदिर के संत-महंत और भक्त जो भी मंदिर भगवान नृसिंह का दर्शन करने पहुंचता है, भगवान श्रीकृष्ण को झूला झुलाता है. सावन माह में भगवान नृसिंह का दर्शन करने आने वाले भक्त लड्डू गोपाल को झूला झुला रहे हैं.

कैसे पड़ी सवान में झूला डालने की परंपरा?
नरसिंह मंदिर के रामजी पुजारी की मानें तो भगवान नृसिंह की स्थापना काल से सावन माह में झूला डालने की परंपरा चली आ रही है. इस मंदिर की पांचवीं पीढ़ी के महंत इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. इस मंदिर के जितने भी श्रीमहंत नरसिंह मंदिर की गद्दी में विराजमान हुए हैं, उनके द्वारा सावन में झूला लगाने के निर्देश मिलते हैं. इस झूले को तैयार करने के लिए नरसिंह मंदिर परिवार, भक्त मंडल एक साथ मिल बैठकर सावन के इस झूले को तैयार करते हैं और इसे भव्य व दिव्य बनाने के लिए आकर्षक साज-सज्जा करते हैं. झूले को हर वर्ष अलग-अलग ढंग से सजाते हैं और दिव्यता प्रदान करते हैं. इस वर्ष भी हरियाली का ध्यान रखकर हरे रंग से झूले को सजाने के लिए चमकीली पन्नी और लाइट का प्रयोग किया गया है और आकर्षक बनाने की कोशिश की गई है.
आध्यत्मिक दृष्टि से झूले का महत्व
आध्यात्मिक दृष्टि से सावन के महीने में झूला डालने की परंपरा वर्षों पुरानी है और इसका धार्मिक और सामाजिक महत्व है. इस परंपरा को पति-पत्नी के प्रेम और सामंजस्य का प्रतीक माना गया है. आध्यात्मिक रूप से मानें तो भगवान शिव ने माता पार्वती के लिए झूला लगाया था. इसके अलावा, सावन में झूला-झूलना का अर्थ एक और भी है. हम सब प्रकृति प्रेमी होते हैं, प्रकृति के साथ जुड़ाव और खुशी का अनुभव करते हैं. खासकर जब चारों ओर हरियाली का वातावरण हो और स्वच्छ हवा मन को प्रफुल्लित कर रही हो और सावन की बूंदे हमें भिगाती हों. ऐसी स्थिति में सावन माह में झूला झुलना लाजिमी है.
नरसिंह मंदिर का इतिहास

जबलपुर में भगवान नरसिंह मंदिर की स्थापना 111 वर्ष पुरानी बताई जा रही है. इस मंदिर के लिखित दस्तावेजों की बात करें तो 1914 के आसपास लिखित कागजी कार्रवाई के उल्लेख मिलते हैं. लेकिन इस मंदिर की स्थापना के लिए बहुत पहले गोरखपुर छोटी लाइन के पास एक तालाब के किनारे संत अयोध्यादास जी महाराज का आगमन हो गया होगा और उन्होंने यहां धूनी रमा ली रही होगी. उसके बाद ही मालगुजारों ने नरसिंह मंदिर स्थापित करने के लिए जमीन दी होगी. यानि नरसिंह मंदिर की स्थापना 1908-09 के आसपास संत सीतारामदास जी महाराज के द्वारा कर दी गई थी. उनके गोलोकगमन के बाद उनके उत्तराधिकारी नृसिंहपीठाधीश्वर स्वामी सीताराम दास जी महाराज श्रीनृसिंह भगवान की गद्दी में विराजमान हुए. उनकी गद्दी श्रीनृसिंहपीठाधीश्वर महामण्डलेश्वर स्वामी रामचन्द्रदास शास्त्री जी महाराज को मिली. सतायु संत स्वामी रामचन्द्रदास जी महाराज वर्षों तपस्या और धर्म ज्ञान दिया और उनका देवलोक गमन हो गया. इसके बाद उनके उत्तराधिकारी जगद्गुरु श्रीनृसिंपीठाधीश्वर डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज नरसिंह मंदिर की गद्दी पर विराजमान हुए. उनके देवलोक गमन के पश्चाता उनके उत्तराधिकारी जगद्गुरु डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज वर्षों पुरानी परंपराओं का भगवान नृसिंह की सेवा में रत हैं.

अष्टधातु से निर्मित है भगवान नृसिंह की मूर्ति

मंदिर के पुराजी रामजी ने बताया कि गोरखपुर जबलपुर में विराजमान भगवान नृसिंह की मूर्ति अष्टधातु से निर्मित है. इस मूर्ति के निर्माता नेपाल के बताए जा रहे हैं. नेपाल के मूर्तिकारों ने भगवान नृसिंह को विराट रूप दिया और उन्हें श्रद्धालुओं के दर्शन कराने में भव्यता प्रदान की. इस मंदिर मंे संत सेवा, गौ-सेवा, गरीब बटुक ब्राम्हणों को शिक्षा-दीक्षा देने के गुर सिखाए जा रहे हैं. दरिद्रनारायण की सेवा में यह मंदिर अग्रणी है.
मंदिर के प्रमुख उत्सव-त्योहार
- नृसिंह प्राकट्य उत्सव.
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
- श्रीराम नवमी
- श्री दुर्गानवमी
- तुलसी जयंती
- आंवला नवमी
- श्रावण मास शिव आराधना
- गुरुपूर्णिमा
- गद्दी आसीन महंतों की पुण्यतिथियां

