सरयूपार की सीमा: सरयूपार भू-भाग की सीमा दक्षिण में सरयू नदी, उत्तर में सारन और चम्पारन का कुछ भाग, पश्चिम में मनारमा या रामरेखा नदी, पूर्व में गंगा और गंडक (शालिग्रामी) नदी का संगम है। इस सरयूपार क्षेत्र की लम्बाई पूर्व से पश्चिम तक सौ कोस के लगभग है। उत्तर से दक्षिण तक पचास कोस से कुछ अधिक है। इस क्षेत्र को सरवार कहते हैं। कुछ विद्वान इसकी सीमा अयोध्या से हरिहर क्षेत्र तक मानते हैं।
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Saryuparin Brahman: इस क्षेत्र के अन्तर्गत ब्राह्मणों का जो पर्व बसा हुआ है उसको “सरवरिया’ या सरयूपारीण ब्राह्मण कहते हैं। इस ब्राह्मण वर्ग में उपाध्याय, ओझा, चतुर्वेदी, त्रिपाठी, द्विवेदी, पाठक, पाण्डेय, मिश्र और शुक्ल ब्राह्मण हैं। उनको व्यवहार में उपाध्या, ओझा, चौबे, तिवारी, दुबे, पाठक, पांडे, मिसिर और सुकुल भी कहते हैं। यह ब्राह्मण वर्ग स्वतन्त्र है। वह ब्राह्मण वर्ग यहाँ का मूल निवासी है। इसके पूर्वज कान्यकुब्ज आदि अन्य ब्राह्मण नहीं थे।
आस्पद
वे ब्राह्मण सरवार में जिन गाँवों में बसे हुए हैं इनको आस्पद (स्थान) कहते हैं। आप कौन आस्पद हैं? ऐसा पूछने पर वे ब्राह्मण उस स्थान के साथ अपने ब्राह्मण वंश का नाम जोड़ कर परिचय देते हैं। जैसे मामखोर के शुक्ल, पयासी के मिश्र आदि ।
गोत्र आदि
प्रत्येक ब्राह्मण किसी एक ऋषि की सन्तान परम्परा में आता है। वह ऋषि गोत्रकार ऋषि होता है। उस ऋषि का नाम ही ब्राह्मण का गोत्र होता है। जैसे, मामखोर के शुक्ल गर्ग गोत्र, पयासी के मिश्र यत्स गोत्र आदि गोत्र के साथ ही उस गोत्र का प्रवर होता है। प्रवर किसी गोत्र का तीन और किसी गोत्र का पाँच होता है। इससे गोत्र की पीढ़ियों का ज्ञान होता है। गोत्र की जानकारी रखना इसलिए आवश्यक होता है कि प्रत्येक शुभ और अशुभ कार्य में संकल्प वाक्य में इसको शामिल करके पढ़ा जाता है। जैसे गर्ग गोत्रोत्पन्नो अमुक नाम आदि। एक समान गोत्र और प्रवर में विवाह नहीं करना चाहिए। इसलिए भी इसकी आवश्यकता पड़ती है। इसके साथ ही प्रत्येक गोत्र का वेद शाखा, सूत्र, शिखा, पाद और देवता भी निर्धारित हैं। प्रत्येक गोत्र का ब्राह्मण अपने गोत्र का वेद, उपवेद शाखा और सूत्र पढ़ता था। निर्धारित क्रम से दाहिनी या बाई ओर से शिखा बाँधता था और पाद को भी पालथी मार कर बैठने और पैर धुलाने में दाहिने या बाँयें पाद का प्रयोग करता था। अपने निर्धारित देवता की पूजा करता था। जीविका वश भब यह सब पढ़ना, पढ़ाना और पालन करना प्रायः लुप्त सा हो गया है। सरयूपारी ब्राह्मणों में अगस्त्य, उपमन्यु कश्यप, कुंडिन कौशिक, गर्ग, गौतम, पराशर, भरद्वाज, भार्गव, वत्स, वशिष्ठ, शांडिल्य (सोहगौरा के), शाण्डिल्य (पीड़ी के), शाण्डिल्य (पाला के), संकृति और सावर्णि ये 17 प्रमुख गोत्र पाये जाते हैं। कौण्डिन्य का कुंडिन सांकृत और सांकृत्य का संकृति तथा सावर्ण्य का सावर्णि शुद्ध रूप है। अतः कुंडिन संकृति और सावर्णि यही कहना चाहिए। इनके अतिरिक्त घृतकौशिक, कात्यायन तथा कुछ अन्य अप्रसिद्ध गोत्र भी हैं। इन सबका वर्णन आगे पृष्ठ 13 से 15 तक किया गया है। किस गोत्र में कौन-कौन से ब्राह्मण हैं. इनका ज्ञान अन्त में दी गई अनुक्रमणिका से होगा।
घर
सरयूपारीण ब्राह्मणों में प्रत्येक गोत्र वाले लोग एक स्थान पर रहने वालों और परिवार वृद्धि तथा जीविका वश दूर जा कर बसने वालों को अपना घर मानते हैं। आप वहाँ कितने घर हैं? ऐसा पूछने पर लोग तदनुसार उत्तर देते हैं। उदाहरण के लिए पृष्ठ 5 पर मामखोर आदि शुक्लों को बताया गया है। वैसे सम्पूर्ण सरयूपारीण ब्राह्मण तीन और तेरह घरों में बँटे हुए हैं। इस सम्बन्ध में एक मत यह है कि गर्ग, गौतम और शाण्डिल्य गोत्र और उनके वंशज तीन घर में और शेष गोत्र के ब्राह्मण और उनके वंशज तेरह घर में आते हैं। दूसरा मत यह है कि तीन घर में मामखोर शुक्ल (गर्ग में) मधुबनी मिश्र (गौतम में) और सोहगौरा त्रिपाठी (शाण्डिल) में हैं।
तेरह घर में
(1) इटारि पाण्डेय (2) इटिया पाण्डेय (3) त्रिफला पाण्डेय (4) नागचौरी पाण्डेय (5) मलॉव पाण्डेय (6) राल्ही मिश्र (7) पयासी मिश्र (8) धर्मपुरा मिश्र (9) काँचनी गुरुदुवान द्विवेदी (10) बड़गों (बृहद ग्राम) द्विवेदी (11) सरारि द्विवेदी (12) पाला त्रिपाठी (13) पीड़ी त्रिपाठी ये ब्राह्मण आते हैं। यह विभाजन उस काल में इन ब्राह्मणों में सदाचार और विद्वत्ता को देख कर किया गया था। छोटे-बड़े या ऊँच-नीच की भावना से नहीं।
पंक्ति
सरयूपारीण ब्राह्मणों में कुछ नियमों और परम्पराओं को लेकर पंक्ति (माँति) का निर्माण हुआ। यह माना गया कि हम लोग ऋषियों की सन्तान हैं। वे ऋषि आपस में किसी ऋषि को छोटा बड़ा नहीं मानते थे। अतः हम लोगों को भी आपस में किसी को बड़ा या छोटा नहीं मानना चाहिए। पंक्ति में सम्मिलित सब ब्राह्मणों को सदाचारी और अध्ययनशील होना चाहिए। पंक्ति से बाहर अपांक्तेय ब्राह्मणों के यहाँ भोजन और विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिए। पंक्ति ब्राह्मणों में परस्पर दहेज न लेना चाहिए। ऐसे पंक्तिपावन ब्राह्मण लोकपूज्य, सदाचारी, विद्वान् और दीर्घजीवी तथा तपस्वी होते थे। यह प्रथा भी अब टूटती जा रही है। सरयूपारीण ब्राह्मणों में पंक्ति प्रथा के अतिरिक्त, चौके से बाहर भोजन न करने, यात्रा आदि में किसी प्रकार का बना हुआ भोजन न ले जाने और होटल आदि में भोजन न करने का नियम था। इस प्रकार सरयूपारीण ब्राह्मणों में गोत्र आदि का निर्धारण, भोजन सम्बन्धी आचार-विचार और पंक्तिबद्धता ये तीन विशेषताएँ ऐसी हैं जो अन्य ब्राह्मणों में नहीं पाई जाती किन्तु अब सरवरिया ब्राह्मणों में भी इनका ह्रास होता जा रहा है।
डीह
सरवार में जहाँ जिस गांव में पूर्वज लोग निवास करते थे उस स्थान की डीह (अभिजन) कहते हैं। वहाँ से छोड़ कर कहीं बाहर जा कर बसने वाले अपने डीह को बताते हैं। जैसे पयासी से प्रतापगढ़ आ कर बसने वाले मिश्र अपना डीह पयासी बताते हैं। डीह तीर्थ के समान पवित्र माने जाते हैं जिसकी डीह सरवार में नही है उनको सरवरिया लोग सरयूपारीण ब्राह्मण नहीं मानते। प्रत्येक सरयूपारीण ब्राह्मण को अपने जीवन में एक बार अपने डीह का दर्शन करना चाहिए।
कंतित
ब्राह्मण वंशों में कुछ स्थानों के नाम के आगे कंतित लिखा गया है। ये कतित भू-भाग के ब्राह्मण हैं। यह भाग मिर्जापुर दक्षिण और माड़ा विजयपुर से लगा है। ये ब्राह्मण सरवार में भी बसे हैं।
(1) शुक्ल वंश
शुक्ल वंश में कश्यप, कुंडिन, कृष्णात्रेय, गर्ग और पराशर गोत्र के शुक्ल होते हैं। इन गोत्रों में गर्ग गोत्र के शुक्लों की संख्या सबसे अधिक है। गोत्र क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है :-
कश्यप गोत्र – सुकरौली, सुरदापार सेखुई।
कुण्डिन गोत्र – कौहाली ।
कृष्णात्रेय गोत्र – पिछौरा ।
गर्ग गोत्र अकोरिया, अकौलिया, अजनौरा, अठौलिया, अमचौना, असौजा, असौजी. आमचौरा, इटवा इस्माइला, उंचहरिया, उमरहर, एकला. एकौना, कॅनइल, ककनाही, ककरही, कचूरे, कटार, कटारी, कटिया, करंजही, कसैला, कसौला, कुरमौलि कुराडीह, कोल्हुआ, खखाइज खोर, गंगोली, गढ़, गलंदा, गोपालपुर मेहरा, गोबरहिया, गौर, गौरा गौरानगरा, चांदागढ़, चिनगहिया, छितुआ, छिपरा, छिबरा, छिबहा, छिलहट, छीछापार, छोटका सराँव, छोटकी भादी, जजन, जवहरी, जरहरिया, जोरहरिया, जिगना जिगनी, जिनवा, झरकटिया, झौआ, टॉठर, दुढौआ, तलहा, तिलहटा, तिलहरा, तुरकहिया तुर्कीलिया, दीक्षापार, धरहट, घरोंछी, धरौलि, धोरहटा, नगरहा, नगरा, नवागाँव, नेवारी, पन्हट, परसा, पिपरा, पैंड़ी, पैंड़ीहथरसा, बकरुआ बकैना, बड़का सरॉव, बड़की भादी, बड़हर, बढ़यापार बनकट, बनगई, बनगवाँ, बबुरा, बभनी वयपोखरि बरवन, बरहट, बरहुचिया बसडीला, बसौढ़ी, बहिड़ा, बहेरी, बाँसपार, बागापार, बायखौरि, बिलौड़ी, बिहरा, बुड़हट, (हरपुर ), बुड़हरी, बेलपोखरि बेलवा, बेलौडी, बेवा, बैजूडीहा, भटिऔरा, भटौली, भरपलिया, भरौलिया, भादी, भिटहा, भेखनौरा, भेड़ी, भेलखा, भेलौंजी, भेसोली, मगहरिया, मझिगवाँ, मटौली, मलेंद (मलेन), महरिहा, महसों, महुलियार, महुली, मामखोर, मुंडा, मुंडेरा, मुंडेरी, मुड़फेकरा, मेहरा, रामनगर, रुदाइन, रुद्रपुर, लखनखोरी, लखनौरा, लोहरौली, विष्णुपुर, सत्य, सरथरी, सरदहा, सराँव (दोनों) सिंघेला, सिटकिहा, सियर, सियरापार, सिरसा, सिलहटा, सीयर, सुकरौटी, सुकुलपुरा, सुकुलपुरी, सेरापार, हॅथरसा, हटवा, हरपुर, हर्दिहा।
पराशर गोत्र- नगवा (कंतित), बरौछा (कंतित) परसा (कंतित), परसाडीह, परिगाँवों, पिकौरा, बूड़ा-परमहंसा (कंतित)।
शुक्ल वंश के ब्राह्मणों का मुख्य स्थान मामखोर है। यह गाँव गर्ग ऋषि के मूल स्थान गगहा (गर्गहा) के पास गोरखपुर से दक्षिण में बसा हुआ है। इसी के पास भेड़ी, बकरुआ आदि गाँव भी बसे हुए हैं।
शुक्ल ब्राह्मणों के प्रसिद्ध स्थान निम्नलिखित हैं :-
1- मामखोर
कॅनइल, करंजी, खखाइज खोर छोटका सरांव, तलहा, परसा, बकरुआ, बहेरी, बरहुचिया, भटौली, भेड़ी, रुदाइन, सीयर, सराँव। १५ घर
2- महसौं
अकौलिया, कटारी, खोरीपाकरि, गोपालपुर, झौआ, बकैना, बसौढी, मुण्डेरा, मेहरा, रुद्रपुर, सिलहटा। १२ घर
3- लखनौरा
आमचौरा, कसैला, गोबरहिया, चिनगहिया, छोटकी भादी, जिगना, जिंगनी. झरकटिया, तुरकहिया, नवागाँव, पैड़ी, भादी, भेलखा, लोहरौली वायखोर, सिटकिहा, हँथरसा, हटवा। १८ घर
4- महुलियार
ककरही, गौरा, छीछापार जरगहिया, टॉठर, दीक्षापार, नगरा, नेवारी, बनगाई, बुड़हर (हरपुर), मलेंद (मलेन), मुड़फेकरा सेरापार, हर्दिहा। 14 घर महसों, लखनौरा, बरहुचिया, और बहेरी, बस्ती जिले में हैं।
(2) त्रिपाठी वंश
त्रिपाठी वंश में अगस्त्य, कश्यप, कौशिक, गर्ग, भरद्वाज, भार्गव, वत्स, वशिष्ठ, शांडिल्य और संकृति गोत्र के त्रिपाठी (तिवारी) ब्राह्मण होते हैं। क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है :-
अगस्त्य गोत्र-तकिया, धन्धवार, धरहरा कश्यप गोत्र- मसौढ़, मसौली, हरगढ़ी
कौशिक गोत्र- बदौलिया, भठवा
गर्ग गोत्र- विष्णुपुर
भरद्वाज गोत्र- खबरौनी
भार्गव गोत्र गजपुरिया, गुरौली, चरणारि, चौमुखा, तुरहापट्टी, धुरयापार, भार्गव, भार्गव परसौनी, मदनपुरा, स्खुआखोर, विष्ठौली, सिंहनजोरी, सोढ़ाचक्र, हरपुर।
यत्स गोत्र-कुड़ा, खजुन्नी धर्मपुर, धर्महरि पोहिला, माजर
वशिष्ठ गोत्र- तिबनी, बँकिया, मणिकठ, वशिष्ठ हन्निहा हन्या (रीवाँ पूज्य)। संकृति गोत्र- जयपुर, बारीडीह।
शाण्डिल्य गोत्र – इस गोत्र में त्रिपाठी ब्राह्मणों की संख्या सबसे अधिक है। इनमें सोहगौरा के शाण्डिल्य, पिंडी के शाण्डिल्य, और पाला के शाण्डिल्य त्रिपाठी लोगों के स्थान को एक अकारादि क्रम से दिया गया है।
शाण्डिल्य गोत्र – अगोरी, अतरौली, उकिना, उद्धवपुर उनवलिया, कटवन, कटियारी, कपरगढ़, कपालगढ, करदहा, कलानी, कटियारी, कसिहार, कसिहारी, कोंधापार, कुकुरगढिया, कुटौली कोटिया, कोठा, कोठी, कोल्हुआ, कोहली, खखरा, खजुआ, खरदहा, खरहरा खोरमा, गहना, गुरम्भी, गोगिहा, गोंडलिया, गोनौरा, गोपालपुर, गोपीकांध, गोरखपुरिया, घरनर या घोडनल, (घोड़नलिया), चंद्रवटा (चन्दरौटा), चरथरी, चिउटहा, चेतिया, चौका, चौधरीपट्टू, चौरा, चौरिहा, चौरी, चौसा, छपरा, छितउनी जोगिया, झकही झुड़िया, टाँडा, टेकवार, डाइनडीहा, तालिबाबाद, तिवारीपुर, तुलसीपुर, दुर्गोलिया, देवरवा देउरवा, देवरिया दोनों.. देवा, धतुरा, धानी नदवली (नदौली), नयापार नरयनापुर, निंदिया, निगुहिया, निर्मोहिया नेवास, नेवासन काँझा नैनसार, नैयापार, नौसढ़िया, पचरुखिया, पड़रौ परतावलि, परसा, परसार, परसोनी, पहिला, पाला, पाला सेमरी, पिपरी, पिपरपाती, पिपांती, पिंडी (पीडी), पुरैना, पौरिहा, पौरिया, बन्दुआरी, बँधना, वंशडिला, बटियाबारी, बदरा, बनकटिया वरपार, बरेजा, बलुआ, वसन्तपुर बसावनपुर, बहुआरी, बारीपुर, बॉसगाँव, बाँसपार, विनवलिया, विराँच, बुटिहा बुढ़ियावारी, बूढ़ीवारी, चेंदुआ, बेलवा, ब्रह्मपुर, भटवा, भरवलिया, भरसहा, भरुहिया, भरोहिया, भलुआ, भलुआनी भाटपार भाटी, भाटे, भादी दोनों, भिटहा भिटहभीटी, भिटा, भिलौनी, भैसहा, भौआपार, मंगरा, मॅगराइच, मऊ, मकदूमपुर, महमूदपुर, महिलवार, महेशपुर, मुंजना, मुण्डेरा, यमुना, रणौली, रसवर्ग देवरिया, रुदहा. रुद्रपुर, रोही, लखनापार, लेदवा, लोनाखार लोनापार, विश्वनाथपुर, शंकराचार्य दुर्गोलिया, शोकनहा, संवरेजी, सकरापार, सरया, साऊखोर, साहरना सिकोना, सिधाँव, सीधावल, सेमरिहा, सेमरी, सेमरी रसवर्ग, सेवई, सनुआ, सोनहुला, सोनाई, सोनौरा, सोनौरी, सोपरी (दोनों) सोहगौरा, सौरेजी, हथियापरास, हरदी ।
शाण्डिल्य गोत्र में तीन शाण्डिल्य होते हैं :-
(1) शाण्डिल्य (सोहगौरा के)
(2) शाण्डिल्य (पिंडी के)
वशिष्ठ गोत्र- तिबनी, बँकिया, मणिकठ, वशिष्ठ हन्निहा हन्या (रीवाँ पूज्य)। संकृति गोत्र- जयपुर, बारीडीह।
शाण्डिल्य गोत्र – इस गोत्र में त्रिपाठी ब्राह्मणों की संख्या सबसे अधिक है। इनमें सोहगौरा के शाण्डिल्य, पिंडी के शाण्डिल्य, और पाला के शाण्डिल्य त्रिपाठी लोगों के स्थान को एक अकारादि क्रम से दिया गया है।
शाण्डिल्य गोत्र – अगोरी, अतरौली, उकिना, उद्धवपुर उनवलिया, कटवन, कटियारी, कपरगढ़, कपालगढ, करदहा, कलानी, कटियारी, कसिहार, कसिहारी, कोंधापार, कुकुरगढिया, कुटौली कोटिया, कोठा, कोठी, कोल्हुआ, कोहली, खखरा, खजुआ, खरदहा, खरहरा खोरमा, गहना, गुरम्भी, गोगिहा, गोंडलिया, गोनौरा, गोपालपुर, गोपीकांध, गोरखपुरिया, घरनर या घोडनल, (घोड़नलिया), चंद्रवटा (चन्दरौटा), चरथरी, चिउटहा, चेतिया, चौका, चौधरीपट्टू, चौरा, चौरिहा, चौरी, चौसा, छपरा, छितउनी जोगिया, झकही झुड़िया, टाँडा, टेकवार, डाइनडीहा, तालिबाबाद, तिवारीपुर, तुलसीपुर, दुर्गोलिया, देवरवा देउरवा, देवरिया दोनों.. देवा, धतुरा, धानी नदवली (नदौली), नयापार नरयनापुर, निंदिया, निगुहिया, निर्मोहिया नेवास, नेवासन काँझा नैनसार, नैयापार, नौसढ़िया, पचरुखिया, पड़रौ परतावलि, परसा, परसार, परसोनी, पहिला, पाला, पाला सेमरी, पिपरी, पिपरपाती, पिपांती, पिंडी (पीडी), पुरैना, पौरिहा, पौरिया, बन्दुआरी, बँधना, वंशडिला, बटियाबारी, बदरा, बनकटिया वरपार, बरेजा, बलुआ, वसन्तपुर बसावनपुर, बहुआरी, बारीपुर, बॉसगाँव, बाँसपार, विनवलिया, विराँच, बुटिहा बुढ़ियावारी, बूढ़ीवारी, चेंदुआ, बेलवा, ब्रह्मपुर, भटवा, भरवलिया, भरसहा, भरुहिया, भरोहिया, भलुआ, भलुआनी भाटपार भाटी, भाटे, भादी दोनों, भिटहा भिटहभीटी, भिटा, भिलौनी, भैसहा, भौआपार, मंगरा, मॅगराइच, मऊ, मकदूमपुर, महमूदपुर, महिलवार, महेशपुर, मुंजना, मुण्डेरा, यमुना, रणौली, रसवर्ग देवरिया, रुदहा. रुद्रपुर, रोही, लखनापार, लेदवा, लोनाखार लोनापार, विश्वनाथपुर, शंकराचार्य दुर्गोलिया, शोकनहा, संवरेजी, सकरापार, सरया, साऊखोर, साहरना सिकोना, सिधाँव, सीधावल, सेमरिहा, सेमरी, सेमरी रसवर्ग, सेवई, सनुआ, सोनहुला, सोनाई, सोनौरा, सोनौरी, सोपरी (दोनों) सोहगौरा, सौरेजी, हथियापरास, हरदी ।
शाण्डिल्य गोत्र में तीन शाण्डिल्य होते हैं :-
(1) शाण्डिल्य (सोहगौरा के)
(2) शाण्डिल्य (पिंडी के)
(3) शाण्डिल्य (पाला के)
इनका विवरण इस प्रकार है-
1- शाण्डिल्य (सोहगौरा के)
सोहगौरा वाले शाण्डिल्य का मूल स्थान सोहगौरा है। यहाँ राम, कृष्ण, मणि और नाथ चार घर हुए ये लोग बाहर जा कर धीरे-धीरे अन्य गाँवों में बसे। वे लोग पहिचान के लिए अपने-अपने नाम के अन्त में क्रमशः राम, कृष्ण, मणि और नाथ लगाते हैं। उनके प्रमुख गाँव निम्नलिखित है-
राम-बतरौली, उनवलिया, कोठा, गहना, झुड़िया, तुलसीपुर, बदरा, बहुआरी, भलुआनी भरूहिया, मऊ, रुद्रपुर, रोहा, विश्वनाथपुर, सरया, सोहगौरा, आदि। कृष्ण – चिउटहा, परतावलि, बनकटिया, बंशडिला, बसावनपुर, बारीपुर, बेलवा आदि ।
मणि- ऊधोपुर, खखरा, खरहरा, तालिबाबाद, देउरवा धानी, नैयापार, बड़की देवरिया, बड़ी सोपरी, बलुआ. बुढ़ियाबारी, भलुआ, वरपार सिधाँव सिरजम सैनुआ, सोनौरा, सोपरी (दोनों) हरदी आदि ।
नाथ- चेतिया, निगुहिया, भिलौनी आदि ।
2- शाण्डिल्य (पिंडी के)
पिंडी (पीडी) से निकल कर कुछ परिवार चन्द्रवटा (चन्दरौटा) और नदवली (नदौली) में बसे फिर नदवली से कटियारी, टांडा, मँगराइच, मऊ, मुजौना, लोनाखार, लोनापार, और संवरेजी आदि में बस गए। फिर टांडा से छिटक कर कपालगढ़, कलानी, कसिहार, कोल्हुआ गोपालपुर, भाटपार, महेशपुर, लखनापार, साऊखोर आदि स्थानों में बस गए। अयोध्या के पं० उमापति त्रिपाठी और औरंगाबाद-वाराणसी के कमलापति त्रिपाठी का परिवार पिंडी के त्रिपाठी है। पिंडी के त्रिपाठी अपने नाम के अन्त में “पति’ लगाते हैं।
3- शाण्डिल्य (पाला के)
पाला से झिटक कर पाला के त्रिपाठी उकिना. कर्दहा, कांधापार, कुसुम्भी. खोरमा, गोनौरा, गोपीकांध, घोडनलिया चरथरी, चौरी, छपरा, जोगिया, देउरिया. नेवासन कौझा, नैनसार, पड़री पुरैना, पोहिला, पौरिया, ब्रह्मपुर आदि स्थानों में बस गये।
(3) पाण्डेय वंश
पाण्डेय वंश में अगस्त्य, कश्यप, कुण्डिन गर्ग, गौतम, चन्द्रायण, पराशर, भरद्वाज, वत्स, वशिष्ठ, शांडिल्य, संकृति और सावर्णि गोत्र के पाण्डेय होते हैं।
इनका विवरण निम्नलिखित हैं।
अगस्त्य गोत्र- अगस्त्यपार, अगस्तिया, अष्टकपाल, पाण्डेयपार, बेदौली, भौआपार महसौं।
कश्यप गोत्र- अघुर्य, आशापुरी, कठैचा, खटहरिया खुटवा, गौरा, चकना, जगदीशपुर, त्रिफला, दतुआखोर, धवरहरा, नेदुला, नाथपुर, परसिया, फरेंदा, बनगाँव, बनगैया, बामपुर, बारहकोनी, भटगाँव, मखौरा, लग्गूपुर, विसनैया । कुंडिन गोत्र-कौड़ी, पलामू, बड़हरिया।
गर्ग गोत्र- इंटिया, ठोकवा, गुडेगाँव, पकड़ी।
नोट- गर्ग के स्थान पर गार्ग्य गोत्र अशुद्ध है क्योंकि गार्ग्य गोत्रकार ऋषि नहीं है। अतः इंटिया पाण्डेय का गोत्र गर्ग ही मानना चाहिए गार्ग्य नहीं। गौतम गोत्र- कटियारी, बुदपरिया, भटगवाँ भटवरिया, रामासार चन्द्रायण गोत्र- बेलौजा।
पराशर गोत्र- इटैली, तरयापार, धमौली, धवरहरा, बामपुरा (कंतित) शिला (शिलासत) सन्त (सोहनपार), हस्तगाँव।
भरद्वाज गोत्र – अध्वर्यु (बड़गों, बलुआ, बाबू मटियारी), कौंसर, तरयापार, तुरोरया, पुरैना, बड़गौ, बडहरा, बलुआ, मँचइया, मवइया मसोइ, लखनापार, सिसवा, सोनौरा।
वत्स गोत्र- अम्बा, इन्द्रपुर, इमिलडीह, चिनहरी, जगदीशपुर, तुकलिया. तुलापुर, त्रिगुनाइत, नागचौरी, नाथपुर, त्रिफला, नेदुला, परसिया, बनहई. बनहाँ, चॉसपार, विनछनेथा, बिलवा, बिष्ठवल, बिष्ठौला, मारिहा, मडरिहा, समकेरवा. सोनइचा, सोनफरवा (परमहंसा कंतित)
वशिष्ठ गोत्र- अम्बा, कोहड़ा, धर्महरि, वशिष्ठ।
शाण्डिल्य गोत्र- मैनछिया।
संकृति गोत्र-कट्यॉ, किरौंदिया, नई, नाउरदेउर, भेलोरा, मलॉव (मलैया) रमवापुर, हरदही।
सावर्णि गोत्र अमिलीडांड, अमिलडीहा, अष्टाकपाल, इन्द्रपुर, इटारि (इटाठी). एकौना, ककेड़ा, करैदा, कोडहा, कोनी, चमरूपट्टी, चारपानी, जामडीह, पिछौरा, ज्वरवा टिकरा, टुमटेकारि, डीहा, देवरिया, नकहट, नयपरिया, पटखा पाण्डेय का सरया, बंधवा, भट्टाचारी, भरोसा, भस्मा, म्यूरहा, रकहट, लहेसरी, सरया सरैया, सखरुआ, सावर्ण्यटिकरा, साहूकोल, सिरसी, सिसई, सिसैया।
इटारि के पाण्डेय के प्रसिद्ध स्थान अमिलडीहा, चारपानी, पाण्डेय का सरया, रकहट, लहेसरी, सावर्ण्य टिकरा है।
उक्त पाण्डेय ब्राह्मणों में इंटिया, इंटारि, त्रिफला, नागचौरी, मलाँव ये पाँच पाण्डेय विशेष प्रसिद्ध है।
(4) मिश्र वंश
मिश्र वंश में कश्यप, कुंडिन, गौतम, घृतकौशिक, पराशर, भरद्वाज, वत्स, वशिष्ठ, शांडिल्य और सावर्णि गोत्र के मिश्र ब्राह्मण होते हैं। गोत्र क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है :-
कश्यप गोत्र- कौड़ीराम, परमेश्वरपुर, मझौली, मिश्रौलिया राढ़ी (राल्ही), सुगौटी।
कुंडिन गोत्र- कौहाली, नगरहा (बस्ती), बँभरौली ।
गौतम गोत्र- अखरचन्दा (अखरचना) अजयासी, अहिरवलिया, ऐंगुरिया. कटगैया, कपाल, कपिशा कारीगाँव, कारीडीह, कोटवा, खदरा, खरगपुरा, खरडर गाँव, गिरिगैया, गैनी, गोइडौरा, गौतम, गौतमपुर, चउरहा, चकौड़ा, चचाई, चतुरी, चम्पारन, चौमुआ, चौमुखा, जरगहिया, डलिहा, डुमराँव, डुमरी, डोलिहा, धोतीगाँव, नरईपुर, पकडीहा, पड़रहा, पतिलाड, पिपरा, पिपरा गौतम, पिपरी, फरिआ, बइसी, बऊडीह, बरईपुर, बसन्तपुर बस्ती बाँसगाँव, बालेडीहा, व्यहसी, भभया, भरसा, भर्सी, भार्गव, भिटहा, भैरोपुर, मटिआरी, मठिया मधुबनी, महावन महुई, मिश्रौलिया, रतनपुर, रापतपुर, रामपुर रेउडा, बेइसी सिंहपुर, सिसई, सेंदुरिया, सोनाखार, हत्यरवा पिपरा हथियाखार।
घृतकौशिक गोत्र- कुशहरा (कुशहर) चक्रपुर, धर्मपुरा, मझौना, मझौनी, लगुनी, लगुनही, हरदिया।
पराशर गोत्र- चोखरि धौरहा, मऊ (मिसिर मऊ), पड़रहा (कंतित) जिरासो (कंतित) लालमनि (कंतित)।
भरद्वाज गोत्र- गजपुरिया, गौर, भौरहा, मझरिया ।
वत्स गोत्र- अप्रैला, अमिहा, उमरी, कतरारी कसली, कुसहा, खुदिया, गाना, गोपालपुर, गाविन्दपुर, चकदहा, चिमरवा, चैनपुर, छपिया, जिगिना, त्योठा, तिलकपुर, दियावाती दोगारी, नगरहा, नवापार पकडीहा, पकरिया, पधौरा, पयासी, परसिया, परसौनी, पानन पिपरा-पयासी, पोयालपुर, पोली, प्रमानिका, फरमैया, बकरिया, बकुलारी, बधौरा, बनकटा पनपरवा पिपरा बरबरिया, बरवलि, बिजरा बीजापुर, बेलोरा, चनुआ, बैरिया, भटनीपार, भरवलिया, गरौलिया, मिटहा, मंझौलिया,
मड़कढ़ा (मणिकढा), मनियारी मलपुरा, महाबन, मुडिला, मुदिसा, मेंहदावल रतनमाला, रानीपुर, रेवली, शैरिया, सेंखुई, सलेमपुर, सुलतापुर।
वशिष्ठ गोत्र- अगौरी, खेउसी खेली, खेसी, बढ़नी, बेलउर, मार्जनी (बट्टूपुर )। शाण्डिल्य गोत्र – जिरासों (कंतित) पियरा पड़रहा (कंतित) लालमनि। इनका पराशर गोत्र भी एक गोत्रावली में मिलता है।
सावर्णि गोत्र- सिसैया।
मिश्र वंश में वत्स गोत्र के ब्राह्मणों के प्रधान स्थान निम्नलिखित हैं :-
(1) गाना गाना, त्यौठा, चकदहा बनवरिया, शैरिया ।
(2) दोगारी – दोगारी ।
(3) नगरहा-अघैला, चैनपुर, तिलकपुर, बनकटा रेउली, सेखुई, सलेमपुर।
(4) पयासी-कतरारी, गोपालपुर, छपिया, जिंगना, परसिया, बिजरा, बीजापुर, बैरिया, भरवलिया, भिटहा, मुंडिला, रतनमाला, रानीपुर।
(5) फरगैंया-दियाबाती, फरिहाँव, मेंहदावल।
(6) बेलौरा-चिमरवा, बकरिया, पानन, बॅधौरा, मँझौलिया सुलतापुर।
(7) मणिकढ़ा- खुदिया, चिमरवा, बँधौरा, बेनुआ, मणिकढ़ा।
मिश्र वंश में गौतम गोत्र मधुबनी मिश्र के अन्य प्रतिष्ठित स्थान निम्नलिखित
अखरचन्दा, कपिशा कारीडीह, चम्पारन जिगना, पिपरा, बऊडीह, बाँसगाँव, बालेडीहा, बेइसी, भभया, भरसी, मटिआरी, रापतपुर रेउडा आदि।
(5) द्विवेदी वंश
द्विवेदी वंश में कश्यप, कृष्णात्रेय, कौशिक, गर्ग, गौतम, भरद्वाज, और वत्स गोत्र के द्विवेदी ब्राह्मण होते हैं। गोत्र क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है :- कश्यप गौरा, परवा, परवा (कंतित) परसया, वत्सपार, बनगैया, ब्रह्मसारी, सिंहेला।
कृष्णात्रेय कुटुरिहा, डोमरिया, डोमरियागंज, पड़रिहा।
कौशिक गोत्र- ब्रह्मपुर।
गर्ग गोत्र – अमवा, कटकुओं, कांटा, कोड़वरिया, खिरकिटा, कोड़रिहा, नीबी, पटौहा, पोयल, भीटी, महुलिया।
नोट- गार्ग्य और गार्ग्येय स्वतन्त्र गोत्र नहीं है। गर्ग गोत्र ही उनका मूल गोत्र है।
गर्ग गोत्र के अन्तर्गत गार्ग्य और गार्ग्येय गोत्र भी कहे जाते हैं। गार्ग्य गोत्र में कोड़वरिया द्विवेदी और खुंटिया पाण्डेय होते हैं। गार्ग्येय गोत्र में नींवी, पटौहा, पोयल और महुलिया के द्विवेदी होते हैं। गार्ग्य या गार्ग्येय गोत्रकार ऋषि नहीं है। गर्ग गोत्रकार ऋषि है। अतः इन लोगों को अपना गर्ग गोत्र ही मानना चाहिए।
गौतम गोत्र उघेला, कंचनिया, कांचनी गुरुदुबान, कांचनी (घुरियापर) काँटा, खरखदिया, गड़री, गड़रहा, गोपालपुर, गौरा, तिलसरा, धनौली, निर्बता, बड़गड़या, बढ़या, बरई पट्टी, बरपार, मझौरा रजहटा, रूपहुलिया, लठिआई सहुबा, सेजरुआ सैचवा, हाटा।
भरद्वाज गोत्र- अमवा, उचेला, कटकुआँ, कुंचेला. कुंडबलिया, केरइहा, गुमदापुर, गौर, चरईपट्टी, छपहा, जलालपुर, ठंठनवापुर, धाराधरी, नकाही पटवरिया, पड़रहा, पालारा, पुछेला, बड़गइया, बड़गों (बृहद्ग्राम), बडरहा बड़ागाँव, बढ़यापार, बरगदी बिनवेहीवाले, बेलगुसौरी, बेलवा, बेलौरी, भरसहा, मंझौआ, मानघटी, मीठाबेल, मुडहा, रमलपुर, रमवापुर, ल्यजरूआ, सँझवा, सचेला, समारि, सरारि, सौरी स्थवर्ग, हड़गड़ी।
वत्स गोत्र- चिमटी, बकुलारी, भरौली, लेजुरिहा, समदरिया (समदारि)।
इनमें से गर्ग गोत्र में कोडवरिया, कौशिक गोत्र में ब्रह्मपुर, गौतम गोत्र में काँचनी गुरुदुवान, भरद्वाज गोत्र में मीठा बेल, बड़गों, बढ़यापार सरारि और वत्स गोत्र में समदरिया द्विवेदी अधिक प्रसिद्ध हैं।
(6) उपाध्याय वंश
उपाध्याय वंश में कश्यप गर्ग, गौतम, पराशर और भरद्वाज गोत्र के उपाध्याय ब्राह्मण होते हैं। गोत्र क्रम से उनका विवरण इस प्रकार है :- कश्यप गोत्र- पकड़ी, बरौली, भरसाँड विशुनपुरा (कन्तित)।
गर्ग गोत्र- लखिमा, पीपरडीहा।
गौतम गोत्र – सुरसती ।
पराशर गोत्र- चौखरि, चौमुख, धनैती, नेदुआ, हस्तग्राम।
भरद्वाज गोत्र-खिरहुआ, खोरिया, खोखरिया, गजपुरिया, गौर, चिकनियाँ. चौखरिया, जैतिहा, डाँड, तोसवा, दवयाँ, दहेंग, दुधौरा, निपनिया, नहफरिया, पडया डीह, पापर, पापरडीह, पिपरा, पिलकिछा, भाऊ, मसौली, मदसार, मौनिछ, मौनिध, राई, रायमऊ, रुद्रपुर, रेवली, विष्णुपुर, लखिना, लमकुश, हड़गडी, हरैया। इनमें से खोरिया के उपाध्याय अधिक प्रसिद्ध है।
(7) ओझा वंश
ओझा वंश में उपमन्यु और कश्यप गोत्र के ओझा ब्राह्मण होते हैं। गोत्र क्रम से उनका विवरण इस प्रकार है:-
उपमन्यु गोत्र- अगाँव, अजॉब, असवनपुर, करैली (ओझौली) कुकुआ, बारी गाँव, ब्रह्मपुर, मलाँव रामडीह, लगुनी, हरजनपुर।
कश्यप गोत्र-खैरी, निपनिया, निमेज, बेनुआ. टीकर, भैंसढ़िया, हरगड़ी। इसमें से उपमन्यु गोत्र के करैली और कश्यप गोत्र के खैरी ओझा अधिक प्रसिद्ध हैं।
(8) पाठक वंश
पाठक वंश में उपमन्यु कश्यप और भरद्वाज गोत्र के पाठक होते हैं। गोत्र क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है-
उपमन्यु गोत्र – बुन्दीपार, भगदरिया लगहरिया ।
कश्यप गोत्र- अजोर, खटहरिया, बिजौरा।
भरद्वाज गोत्र- गोपालपुर, चामतारा, देउवापार, देवगांव, पटखौली, पातुलखा, बूढ़ीपार, भैसौना, मगहरिया, मसोढ़ रहटोली (रहटलि) लखनापार, सोना, सोना मसोढ़, सोनौरा (सोनहुला), हुरवा।
इनमें से सोनौरा के पाठक विशेष प्रसिद्ध हैं।
(6) चतुर्वेदी वंश
चतुर्वेदी वंश में कश्यप कात्यायन, कुशिक, भरद्वाज, भार्गव, वशिष्ठ, संकृति और सावर्णि गोत्र के चतुर्वेदी ब्राह्मण होते हैं। गोत्र क्रम से इनका विवरण इस प्रकार है :-
कश्यप गोत्र-कुसौरा, नयपुरा (कतित), मसोढ़ मसौली, विशुनपुरा (कतित), सोनबरसा, हरगड़ी।
कात्यायन गोत्र- नयपुरा, कुसौरा, पिपरासी।
कुशिक गोत्र- अलीनगर, हरगढ़ (कंतित)।
भरद्वाज गोत्र- टूनघटा, बलुआ, चाबू मँझौली, बूआ,
भार्गव गोत्र- गजपुरिया, चौमुखा।
वशिष्ठ गोत्र- मार्जनी, मंडा ।
संकृति गोत्र- अलीनगर, उनवलि, कुसौरा, डीहा, तेलिया, देउगर, देउडॉह, धुरियापार, नगवा, नयपुरा, भौआपार, मंगलपुर, पॅतबलिया, माधोपुर, सासैंया, सिधया, हरगढ़ (कंतित)।
सावर्णि गोत्र- एकीना।
इनमें से नयपुरा और कुसौरा के चतुर्वेदी अधिक प्रसिद्ध हैं।
कात्यायन ऋषि संकृति गोत्र में पैदा हुए थे। अतः ऐसा लगता है कि बाद के चतुर्वेदी ब्राह्मणों ने अपना गोत्र कात्यायन मान लिया है।
(10) दीक्षित
शाण्डिल्य गोत्र में कीलपुर के दीक्षित भी होते हैं।
गोत्रों का वेद आदि विवरण
(1) अगस्त्य
अगस्त्य गोत्र-यजुर्वेद, धनुर्वेद उपवेद, माध्यन्दिनी शाखा, कात्यायन सूत्र, अगस्त्य माहेन्द्र, मायोभुव 3 प्रवर, शिखा दाहिन, पाद दाहिन शिव देवता है।
(2) उपमन्यु
उपमन्यु गोत्र-यजुर्वेद, धनुर्वेद उपवेद माध्यन्दिनी शाखा, कात्यायन सूत्र वशिष्ठ, उपमन्यु इन्द्रप्रमद 3 प्रवर शिखा दाहिन, पाद दाहिन, शिव देवता हैं ।
(3) कश्यप
कश्यप गोत्र का सामवेद, गन्धर्व उपवेद, कौथुमी, शाखा, गोभिल सूत्र, कश्यप, असित, देवल 3 प्रवर, बाम शिखा, वाम पाद, विष्णुदेवता है।
(4) कुंडिन
कुंडिन गोत्र अथर्ववेद, आयुर्वेद उपवेद, शौनकी शाखा, बौधायन सूत्र वशिष्ट मित्रावरुण, कौण्डिन्य ३ प्रवर, शिखा वाम पाद वाम इन्द्र देवता हैं।
(5) कौशिक
कौशिक गोत्र-यजुर्वेद, आयुर्वेद उपवेद, माध्यन्दिनी शाखा कात्यायन सूत्र, विश्वामित्र, अघमर्षण, कौशिक, 3 प्रवर, शिखा दाहिन, पाद दाहिन, शिव देवता हैं।
(6) गर्ग
गर्ग गोत्र-यजुर्वेद, धनुर्वेद उपवेद माध्यन्दिनी शाखा, कात्यायन सूत्र. आंगरिस, बार्हस्पत्य, भरद्वाज, सैन्य, गार्ग्य 5 प्रवर, शिखा दाहिन, पाद दाहिन शिव देवता हैं।
(7) गौतम
गौतम गोत्र-यजुर्वेद, धनुर्वेद उपवेद, माध्यन्दिनी शाखा कात्यायन सूत्र. आंगरिस, वार्हस्पत्य, गौतम, ३ प्रवर, दाहिन शिखा, दाहिन पाद, शिव देवता हैं।
1- वशिष्ठ, इन्द्रप्रमद, भारद्वाज एक गोत्रावली में है।
साभार-
किशोर ग्रन्थमाला
सरयूपारीण ब्राह्मण गोत्रावली
संकलनकार: पं० द्वारकाप्रसाद शास्त्री
पूर्व संग्रहाध्यक्षः हिन्दी साहित्य सम्मेलनस्थस्य हिन्दी संग्रहालयस्य
वाराणसी, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी
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