MP जबलपुर में अनिल पचौरी की जिद ने बदली खेती की तस्वीर, 10 एकड़ भूमि पर लगे 2 हजार नारियल के पेड़ प्रतिदिन 300 से 400 नारियल का उत्पादन दे रहे हैं.
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Department of Agriculture MP News: जिद के आगे जीत है. यह कहावत चरितार्थ किया है. जबलपुर के एक किसान ने, जिन्होंने महज 8 साल में नारियल का एक बड़ा बगीचा तैयार कर दिया और उससे करोड़पति बनने का सफर तय करने लगा. बताया जाता है कि नारियल के पेड़ केवल खारा पानी के तट पर ही होते हैं. लेकिन नर्मदा का जल भी नारियल पेड़ों के लिए अमृततुल्य साबित हो रहा है. दरअसल मध्य प्रदेश जबलपुर का यह किसान उस समय चर्चा में आया है, जब किसानी करना सबसे महंगा और मेहनतकश धंधा है और लोग किसानी करने से कतरा रहे हैं. ऐसे में जबलपुर का एक किसान संजीवनी बूटी के समान चमत्कारिक प्रयोग करके न केवल प्रशासनिक अधिकारियों को बल्कि किसानों को भी अचंभित कर दिया है. उक्त किसान की मेहनत का सम्मान जबलपुर कलेक्टर ने भी किया है. कलेक्टर के सोशल मीडिया हैंडल से जबलपुर के नारियल उत्पादक किसान की जिद और पर्यावरण से अलग करने की मंशा को उजागर किया गया है. आइए जानते हैं कलेक्टर जबलपुर ने उक्त किसान की मेहनत और जिद का किस प्रकार से व्याख्यान किया है?
समुद्र नहीं, नर्मदा किनारे करूँगा नारियल की खेती, यह जिद जबलपुर के प्रगतिशील किसान अनिल पचौरी की थी. लोगों का मानना था कि नारियल की खेती केवल समुद्री तटीय क्षेत्रों में ही संभव है, लेकिन अनिल पचौरी ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया. आज जबलपुर के लम्हेटाघाट क्षेत्र में उनकी 10 एकड़ भूमि पर लगे 2 हजार नारियल के पेड़ प्रतिदिन 300 से 400 नारियल का उत्पादन दे रहे हैं और शहर के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय स्तर पर नारियल की आपूर्ति की जा रही है.
जिद से शुरू हुआ सफर, आज बन गई मिसाल –
अनिल पचौरी बताते हैं कि उनका आंध्र प्रदेश आना-जाना लगा रहता था. वहां उन्होंने देखा कि कई किसान नारियल और मसाला फसलों की खेती से समृद्ध जीवन जी रहे हैं. किसानों की आर्थिक स्थिति देखकर उनके मन में सवाल उठा कि जब यह खेती दक्षिण भारत में सफल हो सकती है तो जबलपुर में क्यों नहीं?
उन्होंने इस विषय पर गहन अध्ययन शुरू किया. शहर में जहां भी नारियल के पेड़ दिखाई देते, वे रुककर लोगों से उनकी जानकारी लेते. इस दौरान उन्हें यह समझ आया कि जबलपुर की जलवायु में भी नारियल के पौधे जीवित रह सकते हैं और उचित देखभाल के साथ उत्पादन दे सकते हैं.
केरल में किसानों के बीच रहकर सीखी तकनीक –
नारियल की खेती की बारीकियों को समझने के लिए अनिल पचौरी लगभग दो माह तक केरल में किसानों के बीच रहे. उन्होंने खेतों में उनके साथ काम किया और खेती की तकनीकों को व्यवहारिक रूप से सीखा. इस दौरान उन्होंने नारियल की फसल की आवश्यकताओं, सिंचाई प्रबंधन, पौध संरक्षण और पोषण संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कीं.
नर्मदा किनारे मिली सफलता की जमीन –
अनिल पचौरी के अनुसार अध्ययन के दौरान उन्हें पता चला कि नारियल के पौधों को अच्छी नमी और भूजल की उपलब्धता की आवश्यकता होती है. इसी आधार पर उन्होंने नर्मदा नदी के समीप लम्हेटाघाट क्षेत्र में वर्ष 2017 में 10 एकड़ भूमि पर 2 हजार लॉग वैरायटी के नारियल के पौधे लगाए.
लगातार देखभाल, जैविक खाद के उपयोग और उचित सिंचाई व्यवस्था के कारण अब सात वर्ष बाद पेड़ों में भरपूर फल लगना शुरू हो गया है. बाजार में उनके नारियल की अच्छी मांग है और वर्तमान में उनके खेत से प्रतिदिन 300 से 400 नारियल की बिक्री हो रही है.
लाखों की आय का स्रोत बनी नारियल खेती –
अनिल पचौरी बताते हैं कि वर्तमान में नारियल बिक्री से उन्हें प्रतिदिन लगभग 15 से 20 हजार रुपये की आय प्राप्त हो रही है. पूरे सीजन में यह आय 30 से 40 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. श्री पचौरी ने लगभग 10 एकड़ जमीन में लगे 2 हजार नारियल के पेड़ के बीच में अदरक की खेती तथा आम्रपाली, मल्लिका प्रजाति जैसे आमों का प्लांटेशन भी किया है जो की आम के फलों का आंधी-तूफान से रक्षा करते हैं.
कम्पोस्ट खाद का भी ले रहे लाभ –
उन्होंने बताया कि नारियल के पौधों की बेहतर वृद्धि के लिए समय-समय पर खाद का उपयोग किया जाता है. इसके लिए कठौंदा प्लांट से उपलब्ध कम्पोस्ट खाद का लाभ लिया जाता है, जो पंजीयन के बाद किसानों को उपलब्ध कराई जाती है.
अनिल पचौरी की यह सफलता कहानी प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि किसान नई तकनीकों को अपनाने का साहस करें और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो असंभव दिखाई देने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं.

