जबलपुर नरसिंह मंदिर के श्रीमहंत को महाकुंभ प्रयागराज में जगद्गुरु के पद पर हुआ था पट्टाभिषेक, देश के प्रमुख संतों में अपनी पहचान बनाने में हुए कामयाब.
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By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
MP News, Jabalpur : उत्तर प्रदेश का नैमिषारण्य तीर्थ चक्रतीर्थ में सबसे लोकप्रिय हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है. जहां ललितांबापीठ का प्रमुख स्थल है. यहां पर आयोजित कार्यक्रम में सभी धर्माचार्यों को आमंत्रित किया गया था. इसी अवसर पर महाकुंभ मेला प्रयागराज में विगत दिनों मध्य प्रदेश जबलपुर श्रीनरसिंह मंदिर के श्रीमहंत श्रीमद् जगदगुरू डॉ स्वामी नरसिंहदेवाचार्य जी महाराज को श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु के पद से विभूषित किया गया था. उनके इस पट्टाभिषेक कार्यक्रम में जिन संतों व महंतों की उपस्थिति नहीं हो पाई थी. उन संतों-महंतों व महापुरुषों द्वारा शुक्रवार 7 मार्च 2025 को कार्यक्रम में आए संतों ने सम्मानित किया.
इन संतों द्वारा सम्मानित हुए श्रीरामरंगी द्वाराचार्य
नैमिषारण्य तीर्थ में शामिल पूज्य संत महापुरुषों द्वारा श्रीरामरंगी द्वाराचार्य का स्वागत किया गया. इस अवसर पर प्रमुख रुप से श्रीमद जगदगुरू टीलाद्वारा गद्याचर्या मंगल पीठाधीश्वर स्वामी श्री माधवाचार्य जी महाराज, स्वामी षणमुखानंद जी महाराज, हीरापुर वाले, महामंडलेश्वर विद्याचैतन्य जी महाराज, स्वामी प्रणवानंद जी महाराज, महामंडलेश्वर जनार्दन हरी जी महाराज, महामंडलेश्वर मनमोहन दास जी राधेबाबा, श्रीमहंत सीताराम त्यागी जी महाराज एवं अन्य पूज्य संत महापुरुषों की रही उपस्थिति रही.
जबलपुर में आगमन के पश्चात हुआ था भव्य स्वागत
नरसिंह मंदिर शास्त्री ब्रिज जबलपुर के श्रीमहंत श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज जब प्रयागराज से गद्दी पर आसीन होकर मध्य प्रदेश जबलपुर पहुंचे थे, तब उनका स्वागत समाज के अनेक संगठनों द्वारा किया गया था. उनकी विशाल स्वागत यात्रा निकाली गई थी. इसके बाद मंच लगाकार जगह-जगह स्वागत किया गया था. इसके बाद नरसिंह मंदिर में भी अनेक संगठनों द्वारा विशाल मंच पर स्वाागत पूजन किया गया. यह परंपरा आज की नही है. जबलपुर में जो भी ऐसे बड़े पद पर विराजमान होता है. उसका स्वागत कुछ इसी प्रकार से संस्कारधानी के लोग करते हैं.
अपने गुरु के पदचिन्हों पर चल रहे जगद्गुरु
गीताधाम के संस्थापक साकेतवासी जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज के शिष्य श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु़ डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए धर्म पताका फहरा रहे हैं. उनकी वाक पटुता और कार्य शैली बिल्कुल अपने गुरु जगद्गुरु डॉ. श्यामदेवाचार्य जी महाराज से मेल खाती है. इन्हें संत सेवा, गौ सेवा, दरिद्र नारायण की सेवा, नर्मदा परिक्रमा वासियों की सेवा और विद्यार्थी सेवा करने का जुनून और जज्बा है. बहुत कम समय में डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने देश भर में अपनी पहचान बना ली है.
श्रीमद् भागवत कथा सहित अनेक पुराणों के विद्वान
जगद्गुरु डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज श्रीमद्भागवत पुराण, श्री बाल्मीकि पुरान, श्रीराम चरित मानस, देवी पुराण, शिवपुराण सहित कई अन्य हिंदू वेद-पुराणों के विद्वान हैं. इन्हीं पुराणों के माध्यम से धर्म प्रचार-प्रसार देश भर में कर रहे हैं. उनकी भाषा शैली उनके भक्ताें को बहुत पसंद आ रही है, जिसके कारण आए दिन प्रदेश और देश के अनेक हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं. वर्तमान में कई जगह श्रीमद्भागवत महापुराण पर कथाएं आयोजित की जा रही हैं. जिसमें बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित हो रहे हैं.
अपने गुरु के पद से सुशोभित हुए नृसिंहदास
गीताधाम और नरसिंह मंदिर की व्यवस्था वर्षों तक सम्हालने के बाद साकेतवासी जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी श्रीनृसिंहदास जी को बनाया. उसके बाद शैने:-शैने: पूरी जिम्मेदारी नृसिंहदास जी महाराज को सौंपते चले गए. उन्हे जगद्गुरु की विशेष कृपा प्राप्त हुई. जिससे नृसिंहदास को श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज के गोलोक गमन के पश्चात गद्दी आसीन किया गया और उन्हें नरसिंह मंदिर का श्रीमहंत का पद मिला. उसके बाद डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज काे देश भर के संतों ने जिस श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु की गद्दी पर बैठाया था. उसी गद्दी पर अब वर्तमान के नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी नरसिंहदास जी महाराज को श्रीरामरंगी द्वाराचार्य जी की गद्दी पर आसीन किया गया और अब उनका देश भर में सम्मान किया जा रहा है.
गौसेवा और संत सेवा के लिए प्रतिबद्ध
श्रीनृसिंहदेवाचार्य जी महाराज जगद्गुरु के पद पर पट्टाभिषेक किए जाने के पूर्व से ही गौसेवा और संत सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं. उनके द्वारा आश्रम में गौसेवा होती रही है. इसके अलावा गीताधाम-नरसिंह मंदिर में आए संतों का भोजन प्रसाद, आश्रय सहित अनेक प्रकार की सेवा करते रहे हैं.

