पंजाब का प्रमुख त्योहार लोहड़ी 13 जनवरी को मनाया जाएगा. मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर अग्नि जरुर प्रज्वलित की जाती है क्या है इसका महत्व जानें.
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By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Lohri 2026: नव वर्ष में पंजाब प्रांत का प्रमुख उत्सव लोहड़ी की तारीख नजदीक आ गई है. मकर संक्रांति के ठीक एक दिन पहले पड़ने वाले इस त्योहार को पंजाब सहित उत्तर भारत के समस्त जिला और गांव तक मनाने की परंपरा है. लोहड़ी के दिन सिख समुदाय के लोग आग में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली चढ़ाते हैं. आग के चारों तरफ चक्कर लगाकर सभी लोग अपने सुखी जीवन की कामना करते हैं. लोहड़ी का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि यह नई फसल के तैयार होने की ख़ुशी में मनाये जाने की परंपरा है.
लोहड़ी शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार लोहड़ी के दिन सूर्यास्त का समय शाम को 5 बजकर 44 मिनट का रहेगा. ऐसे में सूर्यास्त से 2 घंटे की अवधि लोहड़ी और अग्नि के पूजन के लिए सबसे शुभ रहेगा.
लोहड़ी की अग्नि का महत्व
लोहड़ी पर शाम के समय लकड़ियां इकट्ठा कर के घर के आसपास चौराहे या खुली जगह पर अलाव जलाया जाता है. फिर उसके इर्दगिर्द नृत्य कर के नए फसल की खुशियां मनाते हैं. इस आग को अग्नि देव का स्वरूप माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार अग्नि को देवताओं का मुख माना जाता है. लोहड़ी की पवित्र अग्नि में नवीन फसलों को समर्पित करने का भी विधान है, जैसे तिल, मूंगफली, मिठाई के तौर पर रेवड़ी-गजक आदि आग्नि में अर्पित करने से यह देवताओं तक पहुंचती है, जो प्रार्थना, भोग और कृतज्ञता का प्रतीक है.
मान्यता है कि अग्नि देव और सूर्य को फसल समर्पित करने से उनके प्रति श्रद्धापूर्वक आभार प्रकट होता है ताकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत और लहलहाता रहे. लोहड़ी एक तरह से प्रकृति की उपासना और आभार प्रकट करने का पर्व है. इस पर्व के दिन से रात छोटी होनी शुरू हो जाती है और दिन बड़े होते हैं.
लोहड़ी पर सुनाई जाती है दुल्ला भट्टी की कहानी
मान्यता है कि लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनने का खास महत्व होता है. दरअसल, मुगल काल में अकबर के दौरान दुल्ला भट्टी पंजाब में ही रहता है. कहते हैं कि दुल्ला भट्टी ने पंजाब की लड़कियों की उस वक्त रक्षा की थी जब संदल बार में लड़कियों को अमीर सौदागरों को बेचा जा रहा था.
वहीं एक दिन दुल्ला भट्टी ने इन्हीं अमीर सौदागरों से लड़कियों को छुड़वाया था और तभी से इसी तरह दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि से सम्मानित किया जाने लगा और हर साल हर लोहड़ी पर ये कहानी सुनाई जाने लगी.
हरियाणा और पंजाब के सबसे बड़े त्योहारों में से एक
लोहड़ी सर्दियों के सबसे ठंडे दिनों के अंत का प्रतीक है. यह हरियाणा और पंजाब के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. लोहड़ी 13 जनवरी को पौष या माघ महीने में मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है . लोहड़ी पौष के अंतिम दिन सर्दियों के अंत और माघ के आरंभ (लगभग 12 और 13 जनवरी) का प्रतीक है, जब सूर्य अपना मार्ग बदलता है. यह सूर्य और अग्नि की पूजा से जुड़ा है और सभी समुदायों द्वारा अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, क्योंकि लोहड़ी एक विशिष्ट पंजाबी त्योहार है. सिंधी समुदाय में इस त्योहार को लाल-लोई के रूप में जाना जाता है.
फसल उत्सव है लोहड़ी
लोहड़ी पंजाब और हरियाणा दोनों का फसल उत्सव है, जिसे भारत का अन्न भंडार राज्य कहा जाता है. इसलिए, पंजाब में रहने वाले लोग लोहड़ी को बहुत महत्व देते हैं. पंजाब में गेहूँ मुख्य शीतकालीन फसल है, जिसकी बुवाई अक्टूबर में होती है और कटाई मार्च या अप्रैल में होती है. जनवरी में, खेत सुनहरी फसल की उम्मीद लेकर आते हैं, और किसान फसलों की कटाई और कटाई से पहले इस विश्राम अवधि के दौरान लोहड़ी मनाते हैं. पंजाबियों के लिए, यह सिर्फ एक त्योहार से कहीं अधिक है, यह जीवन शैली का एक उदाहरण भी है.
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