जबलपुर भेड़ाघाट नर्मदा तट का यह स्थान बाण कुंड के नाम से प्रसिद्ध है. यहां से उठाए गए पत्थर को घर पर रखने के बाद प्राण प्रतिष्ठा नहीं करानी पड़ती है.
Source : DB News Update
By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
MP Jabalpur News : मध्य प्रदेश का एक ऐसा शहर जबलपुर है, जहां के शंकर की पिंडी को घर में स्थापित करने पर तिल-तिल कर बढ़ती है. इस रहस्य के बारे में देश भर में चर्चा है. इसी कारण भगवान शिव के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग आज भी भेड़ाघाट की संगमरमर की चट्टानों के बीच शिव की पिंडी ढूढ़ने पहुंच रहे हैं. खास तौर से बारिश के ठीक बाद शंकर स्वरूप नर्मदा नदी के बीच पड़े पत्थरों के मध्य शंकर स्वरूप पिंडी की तलाश में कई लोग दिख जाएंगे. हलांकि सावन में शिवजी की आराधना-पूजा करने के महीने में बड़ी संख्या में लोग आते हैं. क्योंकि यह माह भगवान शिव के लिए समर्पित है. ऐसे शिव भक्तों के लिए मध्य प्रदेश जबलपुर के नर्मदा नदी का भेड़ाघाट जरूर याद आता है. यहां की दुधिया चट्टानों के बीच बहनी नर्मदा की कलकल धार और भगवान भोलेनाथ के दर्शन भी एक साथ हो जाते हैं. इतना ही नहीं शिवभक्त तो यहां से शिव पिण्डी की खरीदारी जरूर करते हैं. नर्मदा पुराण में जैसा वर्णित है कि मां नर्मदा का हर कंकण शंकर स्वरूप में है, इस आधार पर कई भक्त नर्मदा के बाणगंगा कुण्ड से कोई भी पत्थर उठा लेते हैं और अपने घर पर स्थापित कर लेते हैं. उनकी पूजा का फल भी भक्तों को मिलता है.
इस कारण प्रसिद्ध हुआ बाणगंगा कुण्ड
बाण गंगा कुण्ड के बारे में मान्यता है कि भगवान शंकर का ऐसा प्रताप है कि नर्मदा के बीच स्थित इस कुण्ड से जो भी शिवजी का प्रमी श्रद्धा-भक्ति के साथ नर्मदा के बीच स्थित बाण कुण्ड से पत्थर उठाएगा. वह शिव स्वरूप होगा और उस पत्थर को शिव मंदिर या अपने घर पर विराजमान करने के बाद पूजा करेगा. उसे शिवजी का आशिर्वाद प्राप्त होगा. यह मान्यता देशभर में प्रचलित हो गई और शिव भक्त इस कुण्ड से नर्मदेश्वर लेने के लिए यहां आने लगे.
तिल-तिलकर बढ़ती है शिव पिण्डी
मान्यता है कि नर्मदा के इस बाण कुण्ड से जिस पत्थर को भक्त उठाते हैं. वह पत्थर तिल-तिलकर बढ़ता है. समय के साथ शिव स्वरूप में परिवर्तित भी हो जाता है. इसी कारण जिन भक्तों को गोल स्वरूप में पत्थर नहीं मिल पाते हैं. वे यहां का पत्थर किसी भी स्वरूप में कुण्ड से ढूढ़ते हैं और अपने घर ले जाते हैं.
नहीं करानी पड़ती प्राण-प्रतिष्ठा
नर्मदेश्वर महादेव की स्थापना स्वयं भक्तों द्वारा की जा सकती है. नर्मदा से निकाली गई शिव पिण्डी की प्राण-प्रतिष्ठा करने की जरूरत नहीं पड़ती है. मान्यता है कि नर्मदेश्वर महादेव में शंकर का वास होता है. नर्मदा के हर कंकण शंकर के रूप में पूजित है. इसी कारण नर्मदा के किसी भी पत्थर की प्राण-प्रतिष्ठा कराने की जरूरत नहीं पड़ती है.
संगमरमर से होने लगा शिव पिण्डी का निर्माण
इसी मान्यता के तहत भेड़ाघाट के आसपास बड़ी संख्या में शिव पिण्डी का निर्माण शुरू हो गया. वर्तमान में संगमरमर पत्थर से मूर्तियों का निर्माण हो रहा है. भगवान शंकर की मूर्ति के अलावा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है और यहां देश-विदेश से पर्यटक जो भी घूमने आते हैं. वे संगमरमर की मूर्ति अवश्य लेकर जाते हैं. इसी कारण भेड़ाघाट में मूर्ति निर्माण के कारीगरों की संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ी है.
बारिश के बाद बदल जाता है कुण्ड का स्वरूप
बारिश में नर्मदा का बहाव बहुत ही तेज होता है. भेड़ाघाट के आसपास न तो धुंआधार का पता होता है और न ही नर्मदा के घाट दिखाई पड़ते हैं. जिस बाण कुण्ड में भगवान शंकर की पिण्डी मिलती है. वहां तक पहुंच पाना काफी मुश्किल होता है. पानी के इसी तेज बहाव से नर्मदा के पत्थर भी बहकर बाण कुण्ड तक पहुंच जाते हैं और जिस कुण्ड से पूरे साल पत्थर निकाले जाते हैं, उसमें फिर से शिव पिण्डी देखने को मिलने लगती हैं. जिन्हें एकत्रित करके मूर्तिकार अपने पास रखते हैं. क्योंकि उन्हें गढ़ने (शिव स्वरूप) देने की आवश्यकता नहीं होती है.
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