जबलपुर भेड़ाघाट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर को ‘तांत्रिक यूनिवर्सिटी’ के नाम से पहचान मिली है, यहां 64 योगिनी की खण्डित मूर्तियों के होते हैं दर्शन
By : DB News Update | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Chausath Yogini Mandir Jabalpur: हिन्दू राजाओं ने मध्य प्रदेश के कई स्थानों पर धर्म, अध्यात्म और तंत्र-मंत्र से जुड़े मंदिरों की स्थापना कराई थी. जिसका नायाब नमूना जबलपुर भेड़ाघाट धुआंधार के पास स्थित चौसठ योगिनी मंदिर है. जहां की नक्कासी और वास्तु परक स्मारक देखने को मिल रहा है. दूधिया संगमरमर चट्टानों के बीच पहाड़ी पर बना यह मंदिर और विराजमान मूर्तियां पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं. क्योंकि इस मंदिर में संगमरमर की मूर्तियों की स्थापना नहीं कराई गई है. बल्कि भुरभुरे पत्थरों से निर्मित मूर्तियां स्थापित की गई हैं. मंदिर में 81 खण्ड बने हैं. लेकिन यह मंदिर 64 योगिनी के नाम से पहचाना जाता है.
मुगल शासन में खण्डित की गईं मूर्तियां
जबलपुर से करीब 20 किमी दूर भेड़ाघाट पर्यटन स्थल में चौंसठ योगिनी मंदिर स्थापित है. यहां विराजमान योगिनियों को मुगल शासन में खण्डित किया गया था. इतिहासकार बताते हैं कि मुगल आक्रांता औरंगजेब ने यहां की सभी योगिनियों को खंडित किया था. लेकिन मंदिर का ढांचा और यहां की नक्काशी बेहद खूबसूरत है. जिसे बड़ी संख्या में पर्यटक इसे देखने आते हैं. एएसआई ने इसे संरक्षित किया हुआ है.
क्यों पड़ा तांत्रिक विश्वविद्यालय नाम?
देशभर में जबलपुर तंत्र साधना के लिए विख्यात है. यहां तंत्र शास्त्र के आधार पर तंत्र विद्या भी सिखाने की प्रथा थी. जिसे लोग गोलकी मठ के नाम से भी जानते थे, लेकिन मुगलों के आक्रमण के बाद इस मठ का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया. आज भी जब तंत्र साधना की बात होती है तो गोलकी मठ को विशेष तौर पर याद किया जाता है. यह आजकल भेड़ाघाट के चौसठ योगिनी मंदिर के नाम से जाना जाता है. क्योंकि यहां पर विराजमान योनियों में प्रत्येक में एक प्रभामंडल देखने को मिलता है. इन योनियों में 4 से 18 भुजाएं हैं, देवत्व के गुण देखने को मिलता है. उनके चेहरे पर गरिमामय और राजसी मुस्कान नहीं है. योगिनियों में सर्वतोमुखी प्रतिमा के तीन मुख हैं, जिनमें बड़े-बड़े दांत, घने बाल, खोपड़ियों की माला और एक भयानक रूप देखने को मिलता है. वहीं एक चंडिका है , जिसे श्मशान घाट में मानव शव की सवारी करते हुए दिखाया गया है.
अचंभित करते हैं विराजमान शिवलिंग
भेडाघाट संगमरमर चट्टानों के ऊपर करीब ढाई सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में देवी दुर्गा की 64 अनुषंगिकों (योगनियों) की प्रतिमाएं हैं. इनके बीच मंदिर के गर्भगृह में भागवान भोलेनाथ विराजमान हैं. भगवान शिव यहां अपने वाहन वृषभ यानी नंदी पर माता पार्वती के साथ सवार हैं. यह अनोखी शिव प्रतिमा है. यहां आने वाले पर्यटकों को शिव प्रतिमा अचंभित कर रही है.
रानी दुर्गावती के महल को जोड़ती है सुरंग
किवंदतियों ऐसी हैं कि इस मंदिर का निर्माण 2000 वर्ष पूर्व हुआ था. मंदिर के सैनटोरियम में गोंड रानी दुर्गावती की मंदिर की यात्रा से संबंधित एक शिलालेख है. जिसके आधार पर चर्चा की जाती है कि यहां एक सुरंग है जो चौंसठ योगिनी मंदिर को गोंड रानी दुर्गावती के महल से जोड़ती है.
वृत्ताकार में बना है मंदिर
जबलपुर भेड़ाघाट का चौसठ योगिनी मंदिर वृत्ताकार यानी गोल आकार का बना है. बीच में एक नक्कासीदार मंदिर है. इस मंदिर के गर्भगृह में शिव-पार्वती की प्रतिमा है. वृषभ यानी नंदी पर सवार श्रृंगारयुक्त ऐसी प्रतिमा देश में और किसी जगह पर नहीं है. मंदिर त्रिभुजाकार 81 कोणों पर आधारित है, जिसके प्रत्येक कोण पर योगिनी की स्थापना की गई थी.
ऐसी भी है मान्यता
मान्यता हैं कि एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण के लिए निकले तो उन्होंने भेड़ाघाट के निकट एक ऊंची पहाड़ी पर विश्राम करने का निर्णय लिया. इस स्थान पर सुवर्ण नाम के ऋषि तपस्या कर रहे थे जो भगवान शिव को देखकर प्रसन्न हो गए और उन्होंने प्रार्थना की कि जब तक वो नर्मदा पूजन कर वापस न लौटें तब तक भगवान शिव उसी पहाड़ी पर विराजमान रहें. नर्मदा पूजन करते समय ऋषि सुवर्ण ने विचार किया कि यदि भगवान हमेशा के लिए यहां विराजमान हो जाएं तो इस स्थान का कल्याण हो जाएगा. इसी के चलते ऋषि सुवर्ण ने नर्मदा नदी में समाधि ले ली.
कहा जाता है कि आज भी उस पहाड़ी पर भगवान शिव की कृपा भक्तों को प्राप्त होती है. माना जाता है कि नर्मदा को भगवान शिव ने अपना मार्ग बदलने का आदेश दिया था ताकि मंदिर पहुंचने के लिए भक्तों को कठिनाई का सामना न करना पड़े. इसके बाद संगमरमर की कठोरतम चट्टानें मक्खन की तरह मुलायम हो गईं थीं, जिससे नर्मदा को अपना मार्ग बदलने में किसी भी तरह की कठिनाई नहीं हुई.

