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DB News Update | Divya Bhumi News > Blog > Religion > श्राद्ध संस्कारों में त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा का है विधान, जानें वजह…
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श्राद्ध संस्कारों में त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा का है विधान, जानें वजह…

DB News
Last updated: 30/09/2025 11:42 AM
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श्राद्ध पक्ष की शुरुआत हो चुकी है, जो 21 सितंबर को सूर्य ग्रहण के अवसर पर खत्म होगा, ऋग्वेद, गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ और भविष्य पुराण में मिलते हैं प्रमाण, आत्मा को शांत करने के लिए की जाती है पूजा

By : डीबी न्यूज अपडेट | Edited By: प्रिंस अवस्थी

TRIPINDI SHRADDHA: हिंदू धर्म में पितृकर्म और श्राद्ध संस्कारों का विशेष महत्व है. इन कर्मों का उल्लेख ऋग्वेद, गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ और भविष्य पुराण में देखने को मिलता है. श्राद्ध की प्रमुख विधियां हैं, जिसमें त्रिपिंडी श्राद्ध भी शामिल है. त्रिपिंडी श्राद्ध या काम्य श्राद्ध आत्माओं की स्मृति में अर्पित किया जाता है. आत्माओं को शांत करने के लिए यह पूजा मुख्य रूप से की जाती है. त्रिपिंडी श्राद्ध यह अनुष्ठान पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजो के स्मृति में किया गया पिंड दान है.

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श्राद्ध पक्ष की शुरुआत हो चुकी है, जो 21 सितंबर को सूर्य ग्रहण के अवसर पर खत्म होगा, ऋग्वेद, गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ और भविष्य पुराण में मिलते हैं प्रमाण, आत्मा को शांत करने के लिए की जाती है पूजाBy : डीबी न्यूज अपडेट | Edited By: प्रिंस अवस्थीश्राद्ध क्यों किया जाता है?त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा-त्रिपिंडी श्राद्ध विधि-त्रिपिंडी श्राद्ध के लाभत्रिपिंडी श्राद्ध की सामग्री

ज्यादातर लोगों को यह लगता है कि पिछले तीन पीढ़ियों के पूर्वजों (पिता-माता, दादाजी-दादी और उनके माता-पिता) जैसी पिछली तीन पीढ़ियों को संतुष्ट करने से यह अनुष्ठान संबंधित है. कोई भी व्यक्ति का निधन हुआ हो और वे असंतुष्ट हो तो ऐसी आत्माएं अपनी आने वाली पीढ़ियों को परेशान करती हैं.

त्रिपिंडी श्राद्ध पूर्वजों को अपने वंशजों द्वारा किया जाता है, ताकि उन्हें कोई परेशानी न हो. प्राचीन ग्रंथ श्राद्ध कमलकर के अनुसार, यह कहा जाता है कि पूर्वजों का श्राद्ध एक वर्ष में लगभग 72 बार किया जाना चाहिए. यदि यह कई वर्षों तक नहीं किया गया है, तो पूर्वज असंतुष्ट रहते हैं.

श्राद्ध क्यों किया जाता है?

गरुड़ पुराण के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के मृत्यु के 13 दिनों के बाद उसकी आत्मा, यमपुरी के लिए अपनी यात्रा शुरू करती है और उसे वहां पहुंचने में 17 दिन लगते हैं. अगले ग्यारह महीने के लिए आत्मा यात्रा करती है और केवल बारह महीनों में आत्मा यमराज के दरबार में प्रवेश करती है.

ग्यारह महीने की अवधि में आत्मा को भोजन और पानी नहीं मिलता. इसलिए यह कहा जाता है कि पिंडदान और तर्पण परिवार के सदस्यों द्वारा यात्रा के दौरान मृत आत्मा की भूख और प्यास को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है, जब तक कि आत्मा यमराज के दरबार में नहीं पहुंचती. यही कारण है कि श्राद्ध अनुष्ठान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा-

घर में झगड़े, सुख की कमी, अशांति, दुर्भाग्य, असामयिक मृत्यु, विवाह समस्या, असंतोष, संतान और आदि समस्याओं से बचने के लिए, पारंपरिक रूप से त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है. इस संस्कार में, त्रिदेव (भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की पूजा की जाती है, जो क्रोध का प्रतिनिधित्व करते हैं. मृत आत्माओ की तकलीफो को दूर करने के लिए क्रमशः भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा की जाती है.

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि-

  • जब वृद्ध अवस्था मे किसी व्यक्ति का निधन हो जाता है, तो लोग पिंड दान, श्रद्धा और अन्य अनुष्ठान करते हैं, लेकिन जब किसी व्यक्ति का युवा अवस्था में निधन हो जाता है, तो सभी अनुष्ठान सही तरीके से नहीं होते हैं. जो आगे उनकी आत्मा को अमानवीय बंधन का कारण बनती है, इसलिए उन आत्माओं को मुक्त करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना आवश्यक है.
  • इनमें से कोई भी श्राद्ध अगर लगातार तीन वर्षों तक नहीं किया गया तो उस स्थिति में यह श्राद्ध में खंड आ जाता है, जो हमारे वर्तमान जीवन में हमारे पूर्वजों की आत्माओं को दर्द और समस्याओं का कारण बनता है. क्योंकि पर्वज हमारे माध्यम से मुक्ति की उम्मीद करते हैं, जिसे पितृदोष के रूप में माना जाता है.
  • जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में पितृ दोष है, उसे अपने पूर्वजो के मोक्ष के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना आवश्यक है. दोनों विवाहित और अविवाहित लोग त्रिपिंडी श्रद्धा प्रदान करने का अधिकार रखते है, लेकिन एक अकेली महिला इस अनुष्ठान त्रिपिंडी श्रद्धा नहीं कर सकती.

त्रिपिंडी श्राद्ध के लाभ

  1. त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान, तीन पीढ़ियों से पहले के पूर्वजों को शांत करती है और केवल तीन पीढ़ियों (यानी, पिता, दादा और उनके पिता) तक ही सीमित है.
  2. इस पवित्र संस्कार को कम से कम हर बारह साल में एक बार किया जाए.
  3. अगर कुंडली में पितृ दोष दिखाई दे तो यह त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा पितृ दोष के हानिकारक प्रभावों से मुक्ति के लिए सबसे अच्छा माना जाता है.
  4. यदि पूर्वज उनके पीढ़ी द्वारा किये गए अनुष्ठान से प्रसन्न हैं, तो वे आशीर्वाद के रूप में संतान, समृद्धि और सुख के रूप में अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं.
  5. हमारे पूर्वज भगवान के आशीर्वाद के समान हैं. पूर्वजों का आशीर्वाद परिवार और परिवार के सदस्यों को रोग मुक्त और स्वास्थ रहने के लिए सुख और शांति प्रदान करता है. पूर्वजों के लिए यह पूजा करने के बाद, व्यक्ति को जीवन में प्रगति मिलती है.
  6. व्यावसायिक जीवन, विवाह, शिक्षा से संबंधित सभी समस्याओं का निवारण होता है.
  7. ऐसी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने पूर्वजो के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध समर्पित करता है तो उसे भी मोक्ष की प्राप्ति होती है.

त्रिपिंडी श्राद्ध की सामग्री

तीन देवताओं की सोना, चांदी तथा ताम्र से निर्मित प्रतिमा, पिंडदान के लिए काला तील, जौ तथा चावल के बनें पिंड, ताम्र धातू से निर्मित 3 कलश, पुर्णपात्र, गंगाजल, गाय का दूध, आसन, अगरबत्ती, रक्षा सूत्र, जनेऊ, रुद्राक्ष माला, फूल माला, खीर, देसी घी, पंच रत्न, बर्फी, मिठाई, पंचमेवा, लड्डू, खोवा, रुई बत्ती, माचिस, कपूर, अगरबती, घंटा, शंख, हवन पैकट, पान के पत्ते, सुपारी, चावल, गेहूँ, हल्दी, सिंदूर, गुलाल, नारियल, लोटा (बर्तन), हल्दी पाउडर, कुंकुम, रोली, लौंग, उपला, मूंग, ऊड़द, शहद, चीनी, गुड़, दूध, ईलायची, केला, तुलसी का पत्ता, पिली सरसों, भगुनी, परात, चना दाल, काला उरद, सरसों का तेल आदि.

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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